भारतीय भक्ति काव्य परम्परा भारतीय सभ्यता की वह सजीव और सतत प्रवहमान धारा है, जिसने साहित्य को केवल सौंदर्यबोध तक सीमित न रखकर उसे लोक-जीवन, सामाजिक चेतना और नैतिक पुनर्निर्माण का माध्यम बनाया। वेद–उपनिषदों की दार्शनिक पृष्ठभूमि से विकसित होकर यह परम्परा लोकभाषाओं में अवतरित हुई और जनसामान्य के हृदय में ईश्वर, मानव और समाज के बीच एक जीवंत सेतु का निर्माण किया। भक्ति काव्य ने सत्ता, कर्मकाण्ड और वर्ग-भेद से परे जाकर प्रेम, करुणा, मर्यादा और उत्तरदायित्व को जीवन-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। इस भक्ति काव्य परम्परा का प्रथम सर्ग गोस्वामी तुलसीदास को समर्पित है, जिनकी काव्य-दृष्टि ने भारतीय समाज को मर्यादा, लोकमंगल और समन्वय की दृष्टि प्रदान की। तुलसी का काव्य केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक विधान है, जिसमें आदर्श मनुष्य, आदर्श परिवार और आदर्श समाज की संकल्पना अंतर्निहित है। तुलसीदास के माध्यम से भक्ति काव्य परम्परा ने समाज को विखंडन से समन्वय, और वैर से करुणा की ओर उन्मुख किया।
आईटीएम विश्वविद्यालय, ग्वालियर
भारतीय भक्ति काव्य परम्परा के इस सर्गात्मक आयोजन का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक बौद्धिक एवं सांस्कृतिक यात्रा का आरंभ करना है। इस क्रम में प्रत्येक वर्ष भक्ति काव्य परम्परा के एक प्रमुख कवि या संत को केंद्र में रखकर उसके साहित्य, दर्शन और समाज-निर्माण में योगदान का गहन विश्लेषण एवं चिंतन किया जाएगा। प्रथम सर्ग में गोस्वामी तुलसीदास को इसलिए केंद्र में रखा गया है क्योंकि उन्होंने भक्ति को लोक-जीवन से जोड़ते हुए सामाजिक मर्यादाओं, नैतिक अनुशासन और मानवीय मूल्यों को साहित्य के माध्यम से संस्थागत स्वर प्रदान किया। उनके काव्य ने समाज को न केवल आध्यात्मिक दिशा दी, बल्कि संकटग्रस्त समय में सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी प्रदान किया। आगामी सर्गों में कबीर, सूर, मीरा, रैदास, नानक एवं अन्य संत-कवियों को क्रमशः लिया जाएगा, ताकि यह समझा जा सके कि किस प्रकार भक्ति काव्य परम्परा ने विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों में समाज को प्रश्न करने, सुधारने और पुनर्निर्मित करने की भूमिका निभाई। यह आयोजन भक्ति काव्य को एक सामाजिक विमर्श और सभ्यतागत संवाद के रूप में पुनः स्थापित करने का प्रयास है।
दिनांक: 07 नवंबर 2025
समय: सुुबह 10.15 - 12:15
स्थान: उस्ताद अलाउद्दीन खाँ सभागार, एलडीवी (लियोनार्डी दा विंची) ब्लॉक,
आईटीएम विश्वविद्यालय, तुरारी परिसर
व्याख्यान: तुलसी और लोक भाषा
विमोचन: लोहिया के राम (पुस्तिका)
दिनांक: 07 नवंबर 2025
समय: अपराह्न 3:00 – 5:30 बजे तक
स्थान: डॉ. राममनोहर लोहिया सभागार, विक्रम साराभाई ब्लॉक, सिथौली परिसर, आईटीएम ग्वालियर
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी की कालजयी कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ पर रूपवाणी रंग समूह द्वारा नाट्य मंचन निर्देशन: व्योमेश शुक्ल
दिनांक: 08 नवंबर 2025
समय: अपराह्न 3:00 – 5:00 बजे तक
स्थाान: उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान सभागार, एलडीवी, (लियोनार्डी दा विंची), ब्लॉक, आईटीएम विश्वविद्यालय, तुरारी परिसर
‘चित्रकूट’ नाट्य मंचन द्वारा रूपवाणी रंग समूह निर्देशन: व्योमेश शुक्ल
दिनांक: 09 नवंबर 2025
समय: अपराह्न 3:00 – 5:00 बजे तक
स्थान: डॉ. राम मनोहर लोहिया सभागार, विक्रम साराभाई ब्लॉक, सिथौली परिसर, आईटीएम ग्वालियर
व्यााख्याान: तुलसी काव्य की सामाजिकता
‘कठपुतली रामलीला’ नृत्त्य-नाटिका, द्वारा रंग: श्री लिटिल बैले ट्रुप, भोपाल
तुलसी समग्र के अंतर्गत आयोजित सांस्कृतिक एवं विद्वत्तापरक कार्यक्रमों का उद्देश्य गोस्वामी तुलसीदास की काव्य-परंपरा, लोक-संवेदना और सांस्कृतिक दृष्टि को समकालीन समाज से जोड़ना है। इन आयोजनों में अकादमिक विमर्श के साथ-साथ रंगमंच, संगीत, लोककला, चित्रकला एवं पुस्तक संस्कृति की सशक्त उपस्थिति सुनिश्चित की गई है।
तुलसी साहित्य, रामकथा, भक्ति परंपरा, लोकभाषा और सामाजिक चेतना पर केंद्रित विद्वत व्याख्यानों एवं संवाद सत्रों का आयोजन किया गया। देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, आलोचकों, लोकविदों और साधकों ने इन सत्रों में सहभागिता की।
तुलसी काव्य और रामकथा पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से काव्य को मंचीय रूप में जीवंत किया गया।
इन प्रस्तुतियों ने तुलसी के काव्य को दृश्य, श्रव्य और भावात्मक स्तर पर अनुभूत कराया।
तुलसी साहित्य, रामकथा, भारतीय दर्शन एवं सामाजिक चिंतन से संबंधित पुस्तकों का विमोचन एवं प्रदर्शन किया गया।
केंद्रीय पुस्तकालय में आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी में दुर्लभ एवं समकालीन प्रकाशनों को प्रदर्शित किया गया।
भारतीय कला परंपरा की विविध शैलियों को समर्पित प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जिसमें—
जैसी विधाओं का प्रदर्शन किया गया।
तुलसी की लोकधर्मी चेतना को रेखांकित करने हेतु लोकसंगीत एवं पारंपरिक गायन की प्रस्तुतियाँ आयोजित की गईं, जिनमें भक्ति, रामकथा और लोकअनुभव की अभिव्यक्ति प्रमुख रही।
इन सभी सांस्कृतिक एवं विद्वत्तापरक आयोजनों में शिक्षाविदों, कलाकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं साहित्य-संस्कृति प्रेमियों की सक्रिय सहभागिता रही, जिससे तुलसी समग्र एक जीवंत, संवादधर्मी और बहुआयामी आयोजन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
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